प्रज्ञात समाचार । हिजाब विवाद के बाद बिहार छोड़कर कोलकाता चली गईं नुसरत परवीन, फिलहाल उन्होंने नीतीश सरकार की सरकारी नौकरी जॉइन न करने का फैसला किया है। नुसरत इस पूरे घटनाक्रम से मानसिक रूप से बेहद आहत हैं और इसे अपने सम्मान व धार्मिक आस्था पर हमला मान रही हैं।
क्या है पूरा मामला
15 दिसंबर को पटना में नवनियुक्त आयुष चिकित्सकों को नियुक्ति पत्र बांटने के लिए आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मंच पर मौजूद थे। इसी दौरान मंच पर बुलाए जाने पर मुस्लिम महिला डॉक्टर नुसरत परवीन के चेहरे पर लगा हिजाब सीएम नीतीश ने खुद हाथ से पीछे खींच दिया, जिससे उनका चेहरा कैमरों के सामने आ गया। कार्यक्रम का यह वीडियो कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर वायरस की तरह फैल गया और देखते ही देखते बड़ा राजनीतिक व सामाजिक विवाद बन गया।
वीडियो सामने आते ही विपक्षी दलों ने नीतीश कुमार पर महिला की गरिमा और धार्मिक आज़ादी का उल्लंघन करने का आरोप लगाया।
आरजेडी और कांग्रेस समेत कई पार्टियों के नेताओं ने इसे मुस्लिम समाज और खासतौर पर पर्दानशीं महिलाओं के सम्मान पर हमला बताते हुए माफी और कार्रवाई की मांग की।
दूसरी ओर जेडीयू के नेताओं ने बचाव में कहा कि मुख्यमंत्री की नीयत गलत नहीं थी और उन्होंने सिर्फ नुसरत की उपलब्धि को सामने लाने के लिए ऐसा किया।
नुसरत ने क्यों छोड़ा बिहार
विवाद बढ़ने के बाद खबर आई कि नुसरत परवीन ने पटना छोड़ दिया है और वह अपने परिवार के पास कोलकाता चली गई हैं।
बताया जा रहा है कि घटना के अगले ही दिन उन्होंने बिहार छोड़ने का निर्णय ले लिया, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि जिस तरह से उनका हिजाब खींचा गया, वह एक लड़की और एक मुस्लिम महिला के तौर पर उनके लिए बेहद अपमानजनक था। नुसरत के परिजनों के मुताबिक, इस पूरे प्रकरण ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया है और वह खुद को मानसिक रूप से असुरक्षित और अपमानित महसूस कर रही हैं।
परिवार का कहना है कि नुसरत शुरू से ही हिजाब और अपनी धार्मिक पहचान को लेकर संजीदा रही हैं, ऐसे में सार्वजनिक मंच पर देश के एक मुख्यमंत्री द्वारा ऐसा व्यवहार उन्हें गहरे सदमे में डाल गया।
उनके भाई के अनुसार, नुसरत ने शुरुआत में यह घटना सिर्फ घरवालों को ही बताई और काफी देर तक रोती रहीं, बाद में जब वीडियो वायरल हुआ तो दबाव और बढ़ गया। परिवार और दोस्त उन्हें समझा रहे हैं कि भविष्य का सोचकर भावनात्मक फैसले न लें, लेकिन फिलहाल नुसरत बिहार लौटने के मूड में नहीं हैं।
सरकारी नौकरी पर नुसरत का रुख
नुसरत परवीन को आयुष चिकित्सक के रूप में बिहार सरकार की नौकरी जॉइन करनी थी, जिसकी आधिकारिक joining तारीख 20 दिसंबर तय थी। उनका बचपन से सपना डॉक्टर बनकर लोगों की सेवा करने का था, और लंबे संघर्ष के बाद उन्हें यह सरकारी पद मिला था। लेकिन हिजाब विवाद के बाद उन्होंने साफ कर दिया है कि वह इस हालात में बिहार सरकार के अधीन काम नहीं कर पाएंगी और फिलहाल नौकरी जॉइन नहीं करना चाहतीं।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, नुसरत ने परिवार से कहा कि जिस सरकार के मुखिया के साथ ऐसी घटना जुड़ी हो, उसके अधीन सेवा करना उनके स्वाभिमान के खिलाफ है।
उनके भाई ने भी इंटरव्यू में बताया कि बहन अब यह नौकरी छोड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार हैं और इस समय उनका फोकस खुद को emotionally stable करने पर है, न कि करियर के अवसर पर।
हालांकि परिवार ने अंतिम फैसला पूरी तरह नुसरत पर छोड़ दिया है और कहा है कि अगर वह आगे चलकर लौटना चाहें तो वे उनके साथ खड़े रहेंगे।
राजनीतिक तूफान और प्रतिक्रियाएं
इस पूरे मामले ने बिहार की सियासत में तूफान ला दिया है और विपक्ष ने इसे “महिला की अस्मिता” और “मुस्लिम पहचान” का मुद्दा बना दिया है।
आरजेडी नेताओं ने सवाल उठाया कि अगर मुख्यमंत्री को फोटो के लिए चेहरा दिखाना ही था तो वह अनुमति लेकर भी ऐसा कर सकते थे, लेकिन अचानक हिजाब खींचना न केवल गलत संदेश देता है बल्कि संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़ा करता है। कांग्रेस सहित अन्य दलों ने इसे “असंवेदनशीलता” करार देते हुए सीएम से बिना शर्त माफी की मांग की। जेडीयू की ओर से अल्पसंख्यक नेता जमा खान और अन्य प्रवक्ताओं ने बचाव करते हुए कहा कि नीतीश कुमार ने हमेशा मुस्लिम समाज, खासकर पसमांदा वर्ग के उत्थान के लिए काम किया है।
उनका तर्क है कि वीडियो को संदर्भ से हटाकर वायरल किया जा रहा है और विपक्ष इसे राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहा है।
पार्टी का यह भी कहना है कि सीएम ने सिर्फ नुसरत की कामयाबी दिखाने के लिए हिजाब पीछे किया ताकि उनका चेहरा कैमरे में साफ दिख सके, इसमें किसी तरह की नफरत या अपमान की भावना नहीं थी।
सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है, जहां एक बड़ा वर्ग इसे महिला की निजी पसंद और धार्मिक अधिकारों में दखल मान रहा है। अनेक महिला कार्यकर्ता और मुस्लिम संगठनों ने लिखा कि हिजाब पहनना या न पहनना पूरी तरह महिला की अपनी पसंद होनी चाहिए, किसी भी राजनेता या अधिकारी को सार्वजनिक मंच से उसे छूने या हटाने का हक नहीं है।
कई फिल्मों से जुड़े चेहरों, जैसे अभिनेत्री जायरा वसीम, ने भी खुलकर आलोचना करते हुए इसे महिला की गरिमा के खिलाफ बताया और नीतीश से माफी की मांग की।
मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गूंजा और पाकिस्तान के Human Rights Commission of Pakistan (HRCP) समेत कुछ संगठनों ने इस घटना की निंदा की। पाकिस्तानी मीडिया ने भी इसे हिजाब और धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर प्रमुखता से उठाया और भारत सरकार से पारदर्शी जांच की मांग की खबरें छापीं। वहीं सोशल मीडिया पर कुछ कट्टरपंथी अकाउंट्स से भड़काऊ बयान और कथित धमकियों की बात भी रिपोर्ट में सामने आई, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी।
आगे क्या संभावनाएं
फिलहाल नुसरत परवीन कोलकाता में अपने परिवार के बीच हैं और नौकरी जॉइन करने या न करने पर उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया है।
परिवार और करीबी लोग उन्हें समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि वह भावनाओं के बजाय भविष्य की सुरक्षा को ध्यान में रखकर फैसला लें, लेकिन नुसरत का कहना है कि सम्मान और आत्म-सम्मान से बड़ा कोई भी पद या सैलरी नहीं हो सकता। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि वह चाहें तो आगे चलकर कानूनी रास्ता भी अपना सकती हैं, हालांकि अभी तक उन्होंने FIR या कोर्ट जाने का कदम नहीं उठाया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अगर नुसरत खुलकर सामने आकर विस्तृत बयान देती हैं या कानूनी कार्रवाई करती हैं, तो यह मामला नीतीश सरकार के लिए और अधिक मुश्किल खड़ी कर सकता है।
विपक्ष पहले ही इसे चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है, जबकि सत्तापक्ष का प्रयास है कि किसी तरह मामले को “गलतफहमी” बताकर शांत किया जाए। उधर आम लोगों के बीच बहस इस बात पर केंद्रित है कि सत्ता में बैठे लोगों को जनता, खासकर महिलाओं और अल्पसंख्यकों के धार्मिक प्रतीकों के प्रति कितनी संवेदनशीलता बरतनी चाहिए, ताकि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।















































